गरियाबंद में हर गली में ‘डॉक्टर’, सवालों के घेरे में सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग
- गरियाबंद से केशरी साहू की खबर
गरियाबंद.अमलीपदर में गर्भवती महिला की मौत से हिला स्वास्थ्य तंत्र, झोलाछाप–सरकारी गठजोड़ के आरोप
तीन घंटे झोलाछाप इलाज, 15 मिनट CPR और मौत—किसकी जिम्मेदारी?

प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा योजना, जिसे गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच माना जाता है, अमलीपदर क्षेत्र में कागज़ों तक सिमटती नजर आ रही है। हाल ही में सात माह की गर्भवती महिला की संदिग्ध मौत ने न सिर्फ इस योजना की सच्चाई उजागर की है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह घटना केवल एक महिला की मौत नहीं, बल्कि उस सिस्टम की विफलता की कहानी है, जहां सरकारी योजनाएं फाइलों में जिंदा और ज़मीन पर दम तोड़ती दिख रही हैं।

तीन घंटे झोलाछाप इलाज, फिर सरकारी अस्पताल में मौत
मिली जानकारी के अनुसार, महिला की तबीयत बिगड़ने पर उसे पहले लगभग तीन घंटे तक एक झोलाछाप डॉक्टर के क्लीनिक में रखा गया। हालत गंभीर होने पर आनन-फानन में अमलीपदर के सरकारी अस्पताल लाया गया।
आरोप है कि अस्पताल में न तो ओपीडी और न ही आईपीडी रजिस्टर में नाम दर्ज किया गया। करीब 15 मिनट CPR देने के बाद महिला को मृत घोषित कर दिया गया।
यह सवाल अब गूंज रहा है—
बिना रजिस्टर एंट्री इलाज क्यों? क्या सरकारी नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
एक क्लीनिक, चार रेफर और मौतों की परछाई
स्थानीय लोगों का दावा है कि इसी झोलाछाप क्लीनिक से पिछले एक माह में चार गंभीर मरीजों को सरकारी अस्पताल रेफर किया गया। हैरानी की बात यह है कि इन सभी मामलों में इलाज एक ही सरकारी डॉक्टर द्वारा किया गया।
कुछ मरीज बच गए, तो कुछ की मौत हो गई। सवाल उठता है—
क्या यह सिर्फ संयोग है या किसी गहरी मिलीभगत का संकेत?
सरकारी संरक्षण के आरोप, लेन-देन की चर्चाएं
क्षेत्र में चर्चा है कि झोलाछाप डॉक्टरों को मौन सरकारी संरक्षण प्राप्त है। आरोप यह भी हैं कि उन्हें खुली छूट दी गई है—
“पहले आप इलाज कीजिए, मामला बिगड़े तो सरकारी अस्पताल भेज दीजिए।”
इसके बदले आर्थिक लेन-देन की बातें भी सामने आ रही हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
हर गली में ‘डॉक्टर’, गरियाबंद की डरावनी तस्वीर
अमलीपदर, गोहरापदर सहित पूरे गरियाबंद जिले में झोलाछाप डॉक्टरों का जाल फैला होने का दावा किया जा रहा है।
दसवीं फेल लोग स्टेथोस्कोप डालकर मरीज देख रहे हैं।
कुछ घर-घर दवाइयां बांट रहे हैं।
यहां तक कि पशु चिकित्सा से जुड़े कर्मचारी भी मनुष्यों का इलाज करते पाए जा रहे हैं—जो कानून का खुला उल्लंघन है।
नर्सिंग होम एक्ट की उड़ती धज्जियां
नियम साफ हैं—नर्सिंग होम एक्ट में पंजीकरण के बिना कोई क्लीनिक नहीं चल सकता।
लेकिन अमलीपदर क्षेत्र में यह कानून मज़ाक बनकर रह गया है।
इलाज के नाम पर फीस वसूली जा रही है, लेकिन कई मामलों में मरीजों की जान चली जा रही है।
सरकारी अस्पताल भी सवालों के घेरे में
आरोप सिर्फ झोलाछाप डॉक्टरों तक सीमित नहीं हैं।
सरकारी अस्पताल में भी—
बिना रजिस्टर एंट्री इलाज
प्राइवेट मेडिकल स्टोर से दवाइयां लिखना
इलाज के बदले पैसे लेने की चर्चाएं
यह सवाल उठ रहा है कि जिन मरीजों की मौत हुई, क्या उनका नाम कभी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुआ?
पत्रकारों पर दबाव के आरोप
जब मामले की जानकारी लेने पत्रकार सरकारी डॉक्टर के पास पहुंचे, तो डॉक्टर ने दावा किया कि मरीज अंतिम अवस्था में लाई गई थी।
लेकिन आरोप है कि इसके बाद पत्रकारों की फोटो और नाम पीड़ित परिवारों को भेजे गए, जिससे पत्रकारों को धमकी और खबर से दूर रहने का दबाव बनाया गया।
यदि कोई दोष नहीं, तो डराने की जरूरत क्यों?
सीएमएचओ का बयान, जांच के संकेत
जिले के सीएमएचओ यू.एस. नंबरत्ने ने कहा है कि—
“सरकारी अस्पताल में आने वाले हर मरीज की रजिस्टर एंट्री अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं हुआ है, तो संबंधित डॉक्टर को शो-कॉज नोटिस जारी कर जांच की जाएगी।”
पहले भी सामने आ चुका है मौत का मामला
गौरतलब है कि इसी क्षेत्र में एक बंगाली डॉक्टर द्वारा बवासीर के इलाज के बाद मरीज की मौत का मामला भी पहले सामने आ चुका है, जिससे झोलाछाप इलाज की गंभीरता और बढ़ जाती है।
बड़ा सवाल__?
क्या यह सब नया है या वर्षों से चलता आ रहा खेल?
क्या स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा करती है?
फिलहाल, अमलीपदर की यह घटना गरियाबंद जिले के पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी है।




